किनारा- हिंदी कविता – A2Z

मँझधार में क्या मज़ा है, किनारा नहीं जानताकिनारे में क्या ठहराव है, लहरों को इल्म नहींदोनों मलंग हैं अपनी ही रूहानियत मेंअपनी ही नियति में, अपने ही सूरज में। नमकीन मँझधार को पाने की चाहत मेंलहरें किनारे से किनारा करती हैंउठती हैं, बढ़ने की चाहत में, बीच भंवरपर भींग कर, लौटती हैं, बेसब्र और झुँझलाईContinue reading “किनारा- हिंदी कविता – A2Z”