सुबह होने को है – हिंदी कविता

सुबह होने को है ऊंघते अनमनाते पेड़ों की ओट सेरात का कोहरा झांकता हैकोहरा जो हांफता हैअँधेरे को टटोलता है सब दिशाएं सुन्न हैंझींगुर लोरी मैं मगन हैचांदनी रात की अकेली परछाई मेंदूर कोई पंछी फड़फड़ाता हैं एक चिल्लाहट भर केफिर शांत हो जाता हैरात की फुसफुसाहटफिर दबे पैर चलती है फूलों की ठंडी ओसक्यारियोंContinue reading “सुबह होने को है – हिंदी कविता”