किनारा- हिंदी कविता – A2Z

मँझधार में क्या मज़ा है, किनारा नहीं जानता
किनारे में क्या ठहराव है, लहरों को इल्म नहीं
दोनों मलंग हैं अपनी ही रूहानियत में
अपनी ही नियति में, अपने ही सूरज में।

नमकीन मँझधार को पाने की चाहत में
लहरें किनारे से किनारा करती हैं
उठती हैं, बढ़ने की चाहत में, बीच भंवर
पर भींग कर, लौटती हैं, बेसब्र और झुँझलाई सी।

लहरों की आंखमिचोली किनारे और गहराई से
जैसे हंसी ठिठोली, वास्तविकता और परछाई से
मँझधार खींचता है अपनी ओर, लहरों की डोर
पर बंधी रहती हैं वो, एकाग्र एक छोर,

किनारे की गहराई से, नहीं होना उन्मुक्त उनको
मँझधार में किनारा है और किनारे में मँझधार
ये लहरों का समावेश है,ये एक पल मचलती हैं
एक पल ठहरती हैं , किनारे पे।

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प्रबोधन – हिंदी कविता – A2Z

कौतुहल से दूर, स्वयं के पास
प्रकृति में विचरते हुए
पेड़ फूल आसमान को फलते हुए
मैंने देखा है, महसूस किया है

सृजन की शक्ति को
पेड़ों की ओट में, चमकते सूरज को
पत्तों की गोद में, दुलारे फूलों को
हरियाली की छाओं में,ठंडी बयार को

एक पोषण मिलता है
हमारी थकियारी चेतनाओं को
मन में शुद्धि , तन में स्फूर्ति
एक तरोताज़ा छलांग लेती हैं इन्द्रियाँ

आत्मज्ञान की ख्याति बहुत सुनी थी
कल प्रकृति में विचरते हुए
क्षणभर के लिए ही सही
मुझे एक प्रबोधन का एहसास हुआ |

प्रबोधन – meaning = नींद से उठना, जागना।

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औरत-दुर्गा भी, काली भी!- हिंदी कविता – A2Z

जब दुर्गा मिटटी की मूरत है,तो उसकी पूजा करते हैं
पर जब दुर्गा जीवंत है, तब उसकी अवहेलना करते हैं
ढोल,शंकनाद, आरती से प्रतिमा का स्वागत करते हैं
और जब लक्ष्मी ब्याह के लाते हैं, उसका निरादर करते हैं

बहुत हुआ ये दोगलापन, ये आडम्बर, ये दिखावा
नारी तू नारायणी ही नहीं, कालरात्रि और मृत्यु भी है
तू जननी और सौम्य ही नहीं, चंडी और विनाशकारी भी है
धारण कर ले अपना रौद्र रूप, इस पैतृक व्ययवस्था में

जहां समाज के ठेकेदार तुझे जीने नहीं देंगे
चढ़ा के बलि तेरी, तुझे ही अर्पित करेंगे
इंसान के रूप में ये राक्षस, भूत, पिसाच हैं
नाश कर इन नकारात्मकताओं का, बन के आज तू काली

तू स्वयं ही खड़ी हो जा, आज स्वरक्षा में
अम्बिका तू चंडिका बनके, काल का तांडव रचा
ये पापी तब तेरे आगमन से पलायन करेंगे
तेरे अस्तित्व से आतंकित होकर, तुझे नमन करेंगे।

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नारी- हिंदी कविता – A2Z

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मैं ख्वाबों को साड़ी की छोर से बांधती हूँ
मैं रिश्तों को गुल्लक में सहेजती हूँ
मैं अपना परिचय अपने परिजनों में पाती हूँ
मैं पल छीन लम्हों से ज़िन्दगी सजाती हूँ
मैं ख़ुशी में रोती हूँ, गम में मुस्कुराती हूँ
हरा नीला दर्द, दिल की कैफियत छुपाती हूँ
मैं विश्वास के आईने में, आशा की बिंदी लगाती हूँ
मैं मुख़्तसर से दिन में, पूरी ज़िन्दगी जी जाती हूँ
अपने नाम पर पिता और पति के उपनाम की ज़िल्द चढ़ाती हूँ
परतों और दायरों के बीच स्वछंद लहराती हूँ
मैं एक दुआ,एक जज़्बा, एक चिंगारी हूँ
मेरी यही पहचान है, मैं एक नारी हूँ ।

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मुसाफिर – हिंदी कविता – A2Z

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चाँद रात का मुसाफिर
भीनी गलियों में निकल पड़ता है
सितारों की कॉलोनी से गुज़रते हुए
चौराहे पे चल पड़ता है

झोले में चांदनी की छीटें
और खूशबूएं हज़ार है
मतवाला मुसाफिर चाँद है
फुर्सत की रात में टहलता है

रुकता है, सुस्ताता है
मुसाफिरखाने की भीड़ छटती है
फिर चांदनी का कश मारके
रात के सन्नाटे को निगलता है

धीमी आंच में थक हार के पथिक
अंतिम पहर में, घर को लौटता है
रात के हमसफ़र कल फिर मिलेंगे
नयी मंज़िलों की तलाश में।

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लहराता दुपट्टा – हिंदी कविता – A2Z

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ख़ामोशी बातों में, समंदर आँखों में
मुस्कान लबों पे, जवाकुसुम बालों में
और मोगरे का इत्र लगाकर,जब तुम नज़दीक से गुज़रती हो, तो मानो रुक सा जाता हूँ मैं

तुम्हारी चंचलता, तुम्हारी सहजता
तुम्हारा प्रतिबिम्ब, अमिट छाप छोड़ता है मुझपे
वो माथे की बिंदी, वो जुड़वां काले नयना
वो लहराता दुपट्टा, सम्मोहित करता है मुझे

उस दिन तुम्हे जाते हुए, दूर तक देखता रहा था मैं
तुमने मुड़ कर देखा भी नहीं, फिर भी मन नहीं मानता
तुम्हारी कल्पना करता है, तुम्हारा आकांशी है ये
इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ, मैं नहीं जानता।

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कुछ अनकही कुछ अनसुनी – हिंदी कविता – A2Z

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जैसे स्लेट पर कोई चॉक फैल जाती है
वैसी चाँद की धीमी आंच पर
रात का सन्नाटा उबल रहा था
उन रात के सुनसान पलों में
फिर ख्वाइशों ने ज़िन्दगी के नुमाइंदे
बनकर सतह पकड़ी
तुम्हारी कुछ अनकही कुछ अनसुनी बातें
रात की तरह परवाज़ चढ़ने लगी
तुम्हारा अक्स, मुलायम चेहरा
जैसे घुलता गया मेरी दिनचर्या में
“काश” की सीढ़ी लगाकर, सपनों ने
बेशरम होने में , तकल्लुफ ना की
अब रात का तीसरा पहर है
सपने चरमसीमा पर हैं
मुँहजली सुबह को बोल दो, अभी ना आये
मैं अनकही, अनसुनी बातें, बोल सुन रही हूँ।

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जज़ीरा- हिंदी कविता – A2Z

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एक आग का दरिया है
ये मोहब्बत का आगाज़ है
उस जज़ीरे की आस है
जो मझदार में क़यादत करे

मेरी आँखों में समंदर है
फिरभी मैं प्यासी हूँ
इच्छाओं की बदपरहेज़ी है
कोई डूब जाने वाला चाहिये

तुम मिले थे कल मुझे
मचलते ख्वाब में ही सही
एक हसीं लम्हा चुरा लिया था मैंने
आंखमिचोली कर नींद से

नहीं सोचूं तुम्हारे बारे में
तो सपने रुठ जाते हैं
और अगर बुनती हूँ अभिलाषाओं का ताना बाना
तो ज़िन्दगी बुरा मान जाती है।

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Open Mic by Chrysanthemum Chronicles

The first Virtual Open Mic, Chapter 1.0 powered by Chrysanthemum Chronicles happened today on the page ‘The One Hour Talk Show on Facebook!! It was a pleasure and honor to host the show. Please Go and like the page if you haven’t yet and watch the event recordings.
https://www.facebook.com/PoweredbyChrysanthemumChronicles2020

You can watch the event here:-

Thankyou so much everyone for stopping by!! Hope you have a great weekend!

इंद्रधनुष सपनों का- हिंदी कविता – A2Z

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सपनों का इंद्रधनुष देखा है कभी ?
कितना सुरम्य, कितना सजीला होता है
चमकता सात रंगों में है, खुशियां सैकड़ों देता है
अचंभित करनेवाली रंगावली!

एक रंग सपना, एक रंग आशा
एक रंग उन्नति, एक उमंग की परिभाषा
एक रंग मिठास , एक रंग हंसी
एक रंग प्रेम , जैसे रंगों की दीपावली!

दुर्लभ वो दिन होता है,
भीना सा इंद्रधनुष उगता है
आसमान गुलाबी नारंगी होता है,
झंकार की बारिश होती है!

आज फिर सपने प्रफुल्लित हैं
देदीप्यमान इंद्रधनुष मुस्कुरा रहा है
छबीले रंगो की छठा शोभनीय है
मैं ज़रा मनभर भीग तो लूँ !!

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