शाम का मंज़र- हिंदी कविता – A2Z

गर्मी के दिन थे, शाम का समय था,
मैं आँगन में बैठी थी, पर मैं तो कवियित्री हूँ,
तो मैं ऐसा क्यों कहूं? मैं तो कुछ ऎसा कहूँगी
सुरमई सी शाम थी, लू के थपेड़े अब ख़स की ठंडक
में दब रहे थे, बागीचे से गुलाबों की ताज़ी हवा
एक मजमा जमा रही थी, और हवा भी कैसी
जैसे हज़ार घुंघरुओं की पाजेब पहने
थिरक रही हो, मेरे बांकपन को ठिकाना देते हुए
इस अंजुमन में खूबसूरती की बदपरहेज़ी मत पूछो
शाम ए उल्फत में मेरी तिश्नगी मत पूछो
मुसल्लम सी शाम और मुसलसल सी मैं
बेतरतीब ख्यालों से मशक्कत मत पूछो
ज़हनसीब इस रौनक की फ़िज़ा मत पूछो
मैं बेनज़ीर से,गलीचे मेँ खूशबूएं,खयालात छाँटती हूँ
रात का इस्तक़बाल करते महताब की पेशानी पे
अपनी रूह तलाशती हूँ |

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Published by Daisy

I write whenever ideas crunch and overwhelme me! It's my reaction outpour.

4 thoughts on “शाम का मंज़र- हिंदी कविता – A2Z

  1. पर मैं तो कवियित्री हूँ, तो मैं ऐसा क्यों कहूं? How sweet!! Loved each and every word you said in praise of that सुरमई शाम!!

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