औरत-दुर्गा भी, काली भी!- हिंदी कविता – A2Z

जब दुर्गा मिटटी की मूरत है,तो उसकी पूजा करते हैं
पर जब दुर्गा जीवंत है, तब उसकी अवहेलना करते हैं
ढोल,शंकनाद, आरती से प्रतिमा का स्वागत करते हैं
और जब लक्ष्मी ब्याह के लाते हैं, उसका निरादर करते हैं

बहुत हुआ ये दोगलापन, ये आडम्बर, ये दिखावा
नारी तू नारायणी ही नहीं, कालरात्रि और मृत्यु भी है
तू जननी और सौम्य ही नहीं, चंडी और विनाशकारी भी है
धारण कर ले अपना रौद्र रूप, इस पैतृक व्ययवस्था में

जहां समाज के ठेकेदार तुझे जीने नहीं देंगे
चढ़ा के बलि तेरी, तुझे ही अर्पित करेंगे
इंसान के रूप में ये राक्षस, भूत, पिसाच हैं
नाश कर इन नकारात्मकताओं का, बन के आज तू काली

तू स्वयं ही खड़ी हो जा, आज स्वरक्षा में
अम्बिका तू चंडिका बनके, काल का तांडव रचा
ये पापी तब तेरे आगमन से पलायन करेंगे
तेरे अस्तित्व से आतंकित होकर, तुझे नमन करेंगे।

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Published by Daisy

I write whenever ideas crunch and overwhelme me! It's my reaction outpour.

4 thoughts on “औरत-दुर्गा भी, काली भी!- हिंदी कविता – A2Z

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