कुछ अनकही कुछ अनसुनी – हिंदी कविता – A2Z

PC – unsplash

जैसे स्लेट पर कोई चॉक फैल जाती है
वैसी चाँद की धीमी आंच पर
रात का सन्नाटा उबल रहा था
उन रात के सुनसान पलों में
फिर ख्वाइशों ने ज़िन्दगी के नुमाइंदे
बनकर सतह पकड़ी
तुम्हारी कुछ अनकही कुछ अनसुनी बातें
रात की तरह परवाज़ चढ़ने लगी
तुम्हारा अक्स, मुलायम चेहरा
जैसे घुलता गया मेरी दिनचर्या में
“काश” की सीढ़ी लगाकर, सपनों ने
बेशरम होने में , तकल्लुफ ना की
अब रात का तीसरा पहर है
सपने चरमसीमा पर हैं
मुँहजली सुबह को बोल दो, अभी ना आये
मैं अनकही, अनसुनी बातें, बोल सुन रही हूँ।

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Published by Daisy

I write whenever ideas crunch and overwhelme me! It's my reaction outpour.

6 thoughts on “कुछ अनकही कुछ अनसुनी – हिंदी कविता – A2Z

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