क – कतरा कतरा पिघलती शाम– हिंदी कविता – #A2Z



कतरा कतरा पिघलती शाम
मुझमें हर्फ़ – दर – हर्फ़ कुछ उकेरती है
रूहानी रोमानी गुलाबी छटा
कशिश के रंग बिखेरती है ।
ढलता सूरज ढलते आँचल सा मनचला है
मैं हरसिंगार इत्र सी पसरती हूँ
तुम्हारा प्यार रात की तरह भीतरघुन्ना है
मैं दिल के राज़ टटोलती हूँ ।
मेरी तिश्नगी अँधेरे में डूब जाती है
परछाइयों का मेला लग जाता है
मैं रात का कश मारती हूँ
चांदनी अंग जलाती है ।
चाँद, सितारों की मुंडेर पे टहलता है
कोहरे में लिपटे सन्नाटे को निगलता है
चाशनी सी जमी सर्द रात में
फिर तुम्हारा ख़याल रूबरू चलता है ।
तुम टूट के इश्क़ करते हो
मैं प्यार का रिसाव रोकती हूँ
तुम बेपनाह ख्वाइशों को हवा देते हो
मैं रातरानी सी भीनी महकती हूँ ।
तुम पायदान में पैर साफ़ करके
सपनों की अटारी पे आते हो
वो जलती नज़्म छेड़ते हो की
स्याह सी रात धीमी आंच पे सुलगती है
लिहाफ और तुम्हारी बातें मुझे सारी रात ढके रखती हैं ।

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Published by Daisy

I write whenever ideas crunch and overwhelme me! It's my reaction outpour.

28 thoughts on “क – कतरा कतरा पिघलती शाम– हिंदी कविता – #A2Z

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